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Hey this is Ashish. I just love to write these kinda of lines, that's why i am creating this blog. Please enjoy reading and posting....

12 मई 2010

घनियारी रातों में जब हम निपट अकेले होते हैं,

सर रखकर टेबल पर जब हम जोर- जोर से रोते हैं,

पहले ऐसा कुछ न था जो अब क्या हम कुछ खोते हैं,

पहेली ऐसी सुलझी सी है फिर क्यों हम उलझे से होते हैं,

दरवाजे पर आहट होती है भ्रम मे क्यों हम चलते हैं,

पट खोले दरवाजे के तो निपट अकेले होते हैं,

हवा के झोंके लगते हैं तो पल कुछ खुद से दूजे लगते हैं,

ये जाल है कैसा जिसमे खुद से हम फसते जाते हैं,

दिल मे होता है इतना कुछ पर कहने से घबराते हैं,

सच्चाई न माने तो भी आँखों से दर्द निकलते हैं,

सच खोलें तो भी न जाने क्यों हम निपट अकेले होतें हैं,

क्या है क्यों है दिन- दिन भर क्यों ऐसे पूछते रहते हैं,

ये प्यार नहीं तो क्या है क्यों दर्द मे हम रोते रहते हैं,

उसकी यादों मे न जाने क्यों हम बहते रहते हैं,

बस एक कमरे मे जब हम निपट अकेले होते हैं,

सर रखकर टेबल पर जब हम जोर- जोर से रोते हैं….

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