फिर से एक शाम आयी, चाँद निकला एक पैगाम लेकर,
खिड़की पर बैठे इंतज़ार किसी का कर रहा कोई पैगाम लेकर,
चाँद निकला, कितनी खिडकियों पर लगे ताले खुल गए,
चाँद के बहाने कितनो को अपने नसीब वाले मिल गए,
कोई कहता की मैंने अपने चाँद को देख लिया,
कोई कहता की मैंने तो नज़रों में ही भर लिया,
कोई कहता अरे चाँद उनको भी दे ये पैगाम जाकर,
कोई कहता ठहरता क्यों नहीं तू यहीं आज रात भर,
चाँद थोड़ा शरमा गया, बादलों ने उसको छुपा लिया,
खिड़कियों के ताले पड़ने लगे, तो चाँद थोड़ा सकुचा गया,
झट से निकला बादलों से, कहने को बस यही,
मै चला इन प्यारे चेहरों का पैगाम लेकर,
मिल लेना अपने प्यार से बस यु ही, मुझसे आंखें चार कर,
फिर से एक शाम आयी, चाँद निकला एक पैगाम लेकर......

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