कभी कोई अलविदा कहे तो कैसा लगता है,
जैसे कोई पत्ता अभी- अभी शाख से टूटकर गिरा है,
कभी कोई सूना कर जाये इस दिल को तो कैसा लगता है,
जैसे पतझड़ बस अभी इन शाखों पर गिरा है,
कभी कोई लौट आने का वादा करे तो कैसा लगता है,
जैसे कहीं सावन के इंतज़ार मे कोई प्यासा बैठा है,
कभी आंखें पथरा जायें रस्ता निहार, तो कैसा लगता है,
जैसे बदली का करे कोई सूखा इंतज़ार ऐसा लगता है,
कभी टूटकर फिर से संभलना पड़े तो कैसा लगता है,
जोड़कर गाठ धागे को फिर से जोड़ना जैसा लगता है,
कभी मिले नज़र और फिर ना मिले दोबारा तो कैसा लगता है,
शराब से बिछुड़ कर एक शराबी को जैसा लगता है.....

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